शिक्षा (एनपीई) 1986 और एक्शन (पीओए) पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति विशेष रूप से जिला में शिक्षक सशक्तिकरण कार्यक्रमों की शैक्षिक नियोजन में शैक्षणिक कार्य का समर्थन करने केलिए एक तिसरे स्तर (जिला स्तर) संस्था की परिकल्पना की गई.जो आज के समय मे शिक्षा और प्रशिक्षण के जिला संस्थान (डायट) के नाम से जाना जा राहा है। शिक्षक की तैयारी की प्रक्रिया कुछ खास तरह कि ज्ञान और कौशलों में दक्षता की मांग करती है ।

अध्यापक-शिक्षा का एक अनिवार्य अंग है बच्चों को समझना (उनके विकास व सीखने की प्रक्रिया के साथ) इस क्रम में बच्चों के विभिन्न पहलुओं जैसे मानसिक , सामाजिक, नैतिक व शारीरिक विकास को समझने के क्रम में हमें विभिन्न मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों को भी समझना होगा ।

अध्यापक-शिक्षा का एक अन्य महत्त्वपूर्ण आयाम है ‘शिक्षा के साहित्य’ से परिचय, ताकि शिक्षक साहित्य, संस्कृति और समाज के परिपेक्ष्य में शिक्षा को समझ सके। इसकी जानकारी के लिए जरूरी है कि हम उन अनुभवों को जाने जिसे बच्चों के साथ काम करते हुए दर्ज किया गया है।

  1. समावेशी शिक्षा के लिए एक शिक्षक-शिक्षिकाओं को यह जानकारी होनी चाहिए कि बच्चों में कई प्रकार की भिन्नताएँ होती हैं। कुछ बच्चे धीरे-धीरे सीखते हैं, जबकि कुछ रफ़्तार में। कई बच्चों को अधिक सहारे और मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है जबकि अन्य बिना किसी सहारे स्वयं सीख लेते हैं। यह मान्य है कि धीरे-धीरे सीखने वाले बच्चों को अधिक समय की आवश्यकता होती है, कक्षा के अन्दर हो या बाहर। समावेशी शिक्षा का तात्पर्य है सभी बच्चों को तरह-तरह की भिन्नताओं के बावजूद उन्हें पठन-पाठन का अवसर एक ही प्रकार के वर्ग के रूप में समान रूप से प्राप्त होगा। इसकी विशेषता यह है कि एक समरूप माहौल में समानता के साथ कई प्रकार की भिन्नता एवं विषमता के होते हुए भी सभी के लिए शिक्षा की व्यवस्था करना। यहाँ यह भी जान लेना आवश्यक है कि कुछ बच्चे होंगे जिन्हें विशेष जरूरत वाले बच्चों के रूप में चिन्हित किया गया हो। ऐसे बच्चों की कुछ श्रेणी निम्न है:
    1. हियरिंग इम्पेयरमेंट (सुनने व बोलने की दिक्कत
    2. मेंटल रिटार्डेशन (मानसिक दिक्कत)
    3. लोकोमोटर इम्पेयरमेंट (शारीरिक व मांसपेशीय दिक्कतें)
    4. विजुअल इम्पेयरमेंट (दृष्टि सम्बन्धी दिक्कतें)
    5. लरनिंग डिसएबिलिटीज (सीखने सम्बन्धी दिक्कतें)

    शिक्षक को अपने कर्तव्य के निष्पादन में उपर्युक्त श्रेणी के बच्चों की विशेष आवश्यकताओं को ध्यान में रखना होगा, ताकि बच्चों को अपनी कमियों का एहसास कम हो। इस सबके अलावा शिक्षक को विभिन्न विषयों और उनके पढ़ाये जाने के तरीकों की भी जानकारी होनी चाहिए । मुख्य तौर पर निम्न विषय के शिक्षण के तरीके तथा उनके विषय वस्तु और उसके शिक्षा शास्त्र की।
    1. गणित
    2. विज्ञान (पर्यावरण व परिवेश के संदर्भ में)
    3. समाज विज्ञान (परिवेश से जुड़ा)
    4. भाषा – हिंदी, अंग्रेजी एवं मातृभाषाएँ।
    5. दस्तकारी और हाथ से किये जाने वाले अन्य कार्य जैसे लकड़ी का काम, लोहे का काम, मिट्टी का काम, खेती, बागवानी इत्यादि।
    6. प्रारंभिक विद्यालयों के शिक्षक के लिए यह जरूरी है कि वह पढ़ाने में मददगार कुछ बुनियादी कौशलों से परिचित हों। (सम्प्रेषण का कौशल, नाट्यकला, संगीत, चित्रकला इत्यादि)
    7. योग, शारीरिक शिक्षा तथा आहार व पोषण की जानकारी।